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मंगलवार, 17 सितंबर 2013

नया बचपन-सुभदरा कुम्हारी चौहान।

बार बार आती है मुझको मधुर याद बचपन तेरी |
गया ले गया तू जीवन की सबसे मस्त खुशी मेरी ||
चिंता रहित खेलना खाना वह फिरना निर्भय स्वछंद?
कैसे भूला जा सकता है बचपन का अतुलित आनंद?
उंच नीच का ज्ञान नही था , छुआ छूत किसने जानी?
बनी हुई थी वहां झोपडी और चीथड़ों में रानी ||
किए दूध के कुल्ले मैंने चूस अंगूठा सुधा पीया |
किलकारी किल्लोर मचाकर सूना घर आबाद किया ||
रोना और मचल जाना भी क्या आनंद दिखाते थे |
बड़े बड़े मोती से आंसू जय माला पहनाते थे ||
मैं रोई, मां काम छोड़कर आई, मुझको उठा लिया |
झाड़ फूंक कर चूम चूम गीले गलों को सुखा दिया ||
दादा ने चंदा दिखलाया नेत्र नीर- युत दमक उठे |
धुली हुई मुस्कान देखकर सबके चहरे चमक उठे ||
वह सुख का साम्राज्य छोड़कर मैं मतवाली बड़ी हुई |
लुटी हुई कुछ ठगी हुई सी दौड़ द्वार पर खड़ी हुई ||
लाज भरी आँखें थी मेरी मन में उमंग रंगीली थी |
तान रसीली थी कानों में चंचल छैल छबीली थी ||
मन में एक उमंग सी भी थी ये दुनिया अलबेली थी |
दिल में एक चुभन सी थी मैं सबके बीच अकेली थी ||
मिला, खोजती थी जिसको हे बचपन! ठगा दिया तूने |
अरे जवानी के फंदे में मुझको फंसा दिया तूने ||
सब गलियां उसकी भी देखीं उसकी खुशियाँ न्यारी हैं |
प्यारे प्रीतम की स्म्रतियों की रंग रलियाँ भी प्यारी है ||
माना मैंने युवा काल का जीवन खूब निराला है |
आकांशा पुरुसार्थ ज्ञान का उदय मोहने वाला है
किंतु यहाँ झंझट है भारी युद्ध छेत्र संसार बना |
चिंता के चक्कर में पड़कर जीवन भी है भार बना ||
आ जा बचपन ! एक बार फ़िर दे दे अपनी निर्मल शान्ति |
व्याकुल व्यथा मिटाने वाली बह अपनी प्राकृत विश्रांति ||
वह भूली सी मधुर सरलता वह प्यारा जीवन निष्पाप |
क्या आकर फ़िर मिटा सकेगा तू मेरे मन का संताप?
मैं बचपन को बुला रही थी बोल उठी बिटिया मेरी |
नंदन वन सी फूल उठी वह नन्ही सी कुटिया मेरी ||
'मां ओ' कह कर बुला रही थी मिटटी खा कर आई थी |
कुछ मुह में कुछ लिए हाथ में मुझे खिलाने आई थी ||
पुलक रहे थे अंग द्रगों में कौतुहल था छलक रहा |
मुहं पर थी आह्लाद लालिमा विजय गर्व था झलक रहा ||
मैंने पूछा ये क्या लाई बोल उठी 'माँ काओ' |
हुआ प्रफुल्लित ह्रदय खुशी से मैंने कहा-' तुम्ही खाओ' ||
पाया मैंने बचपन फ़िर से बचपन बेटी बन आया |
उसकी मंजुल मूर्ती देख कर मुझ में नव जीवन आया ||
मैं भी उसके साथ खेलती खाती हूँ, तुतलाती हूँ |
मिलकर उसके साथ स्वयं मैं भी बच्ची बन जाती हूँ ||
जिसे खोजती थी बरसों से अब जाकर उसको पाया |
भाग गया था मुझे छोड़कर वह बचपन फ़िर से आया ||

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